Friday, September 29, 2023
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रेवाड़ी News – लोक कवि मास्टर नेकीराम जी का अहम योगदान रहा सांग कला की लोकप्रियता बढ़ाने में!

रेवाड़ी – आज हरियाणा के महान संत सम्राट एवं लोक कवि मास्टर नेकी राम जी की पुण्यतिथि है, जिन्होंने सांग कला का संरक्षण किया और इसे और भी ज्यादा लोकप्रिय बनाया। मास्टर नेकीराम रेवाड़ी के गांव जैतड़ावास के निवासी हैं, इनकी पीढ़ियां सांग कला को समर्पित रही, इनके परिवार ने सांग कला को 100 वर्षो तक जिंदा रखा। आइए आज मास्टर नेकीराम जी पुण्यतिथि के उपलक्ष में प्रकाश डालते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ अहम घटनाओं पर;

बचपन में ही ली सांग कला की शिक्षा: 

नेकी राम जी का जन्म 6 अक्टूबर 1915 को हुआ, इनकी माता का नाम श्रीमती लाडो देवी था और इनके पिता मास्टर मूलचंद उस समय के प्रसिद्ध सांग सम्राट थे, बचपन से ही संगीत के प्रति रुचि रखने वाले नेकी राम ने सांग कला की शिक्षा अपने पिता से लेनी शुरू कर दी, उनके पिता से विरासत के रूप में मिली। आगे चलकर नेकीराम ने इस कला को इतना प्रचलित कर दिया कि ये कला आज रेवाड़ी के इतिहास में एक मिसाल के तौर पर पहचानी जाती है। 

बाबा गोपाल नाथ के आशीर्वाद मिला: 

हालांकि सांग कला की प्राथमिक शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ग्रहण की, लेकिन कुछ समय बाद इन्होंने अलवर के शामधा में स्थित बाबा गरीब नाथ  के महंत  बाबा गोपाल नाथ को अपना गुरु बना लिया, जिनके आशीर्वाद से मात्र 14 वर्ष को आयु में इन्होंने मंच पर पहली सांग भगत पूर्णमल की प्रस्तुति की। 

सफलता ने चूमे कदम:

कहते हैं अगर लगन सच्ची हो तो सफलता कदम चूमती है, नेकीराम का सांग कला के प्रति समर्पण भी  कुछ इसी तरह का था। अपनी पहली प्रस्तुति के बाद नेकीराम ने सफलता की सीढ़ियां चढ़नी शुरू कर दी और लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे जहां पर बहुत कम लोग ही पहुंच पाते हैं। कुछ समय बाद सांग पार्टी के मुखिया नेकीराम बनाए गए और आपको जानकर हैरानी होगी कि ये उस समय सबसे कम उम्र के सांग पार्टी के मुखिया थे।

लगातार साठ वर्षों तक किया सांग मंचन:

अपने जीवन काल में मास्टर नेकीराम ने 36 से भी ज्यादा सांग की रचना की और 60 वर्ष तक सांग का मंचन करते रहे। इनका एक सांग का प्रोग्राम लगभग 7-8 घंटे तक चलता था। इनके अंदर एक विशेषता थी कि रात्रि ढलने के साथ साथ इनकी आवाज की मधुरता बढ़ती जाती थी इसलिए लोग इनकी सांग कला के दीवाने थे। मास्टर नेकीराम की रुचि जनहित कार्यों में भी थी, अपने जीवनकाल में इन्होंने बहुत से जनहित कार्य किए।  आज उनकी इस कला को आगे बढ़ा रहें है उनके शिष्य, बुद्धराम, सोनू नावदी,छाजूराम राजवाड़ा और ईश्वर सिंह बाछौद, उसके साथ साथ लोकगायक चंद्रभान भी सांग की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। 

मास्टर नेकीराम का जीवन पूरी तरह से सांग को समर्पित था। सांग का मंचन करते हुए 10 जून 1996 को मास्टर नेकीराम ने अपनी अंतिम सांस ली, लेकिन सांग कला को वो विरासत के रूप में अपने शिष्यों को दे गए। 

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